5 Best Motivational Stories In Hindi – प्रेरणादायक कहानियां

Motivational Stories In Hindi: भारत में ही नहीं, दुनिया में ऐसे करोड़ों लोग मौजूद हैं, जो कि अपने जीवन को सफल बनाना चाहते हैं। और वहीं कुछ लोग अपने जीवन से हार चुके हैं। लेकिन उनके अंदर मौजूद सफलता के इच्छा को पूरा करने के लिए उन्हें एक प्रेरणादायक सोच की जरूरत है।

Motivational Stories In Hindi

इस वजह से आज के इस लेख के जरिए हम आपको पांच ऐसे जिंदगी बदल देने वाली प्रेरणादायक कहानियों के बारे में बताने वाले हैं, जिन्हें सुनकर 100% आपकी सोच बदलेगी।

Motivational Stories In Hindi – जीवन बदलने वाली प्रेरणादायक कहानियां

1. खुशी

एक बार एक युवक, एक संत के पास चला जाता है और उनसे कहता है कि गुरु जी मेरे जीवन में खुशी ही नहीं है, मैं क्या करूं? जब मैंने सोचा कि जब मुझे बहुत बड़ी नौकरी मिल जाएगी, तो मैं अपने पापा को अपनी कार गिफ्ट करूंगा।

लेकिन जब मुझे नौकरी लगे तो पापा जी गुजर गए। इसके बाद मेरे मन में यह ख्याल आया कि जब प्रमोशन मिल जाएगी, तो मैं अपने बेटों को पिकनिक ले जाऊंगा। लेकिन कभी मुझे प्रमोशन मिला ही नहीं। क्या मुझे मेरी जिंदगी में कभी खुशी मिलेगी या नहीं।

गुरुजी हंसने लगे और उन्होंने उस युवक से कहा की “पास में मौजूद उस गार्डन में जाओ और उस गार्डन में मौजूद सबसे अच्छे गुलाब के फूल को तुम तोड़ के लाओ और शर्त यह है कि जब तुम एक बार जब एक फूल से आगे निकल गए, तो वापस नहीं आ सकते।

तो वह युवक सबसे अच्छा गुलाब का फूल तोड़ कर लाने के लिए निकल पड़ा। उसे पहले तो बहुत सारे अच्छे गुलाब के फूल दिखे। लेकिन वह यही आस में रहा कि आगे इससे भी अच्छे गुलाब के फूल मिलेंगे और मैं उसे तोड़कर गुरुजी के पास ले जाऊंगा।

आगे बढ़ता गया, बढ़ता गया लेकिन अंत में उसे सब मुरझाए हुए फूल दिखे और उनमें से उसने थोड़े मुरझाए हुए एक फूल को उखाड़कर गुरुजी के पास ले आया और गुरु जी से कहा “मुझे पहले तो बहुत सारे अच्छे सुंदर खिले हुए फूल मिले थे। लेकिन मैं उन्हें नजरअंदाज करके आगे निकल पड़ा।

गुरुजी ने कहा कि इसे तुम अपनी जिंदगी समझो, हमें जिंदगी में कोई भी छोटी बड़ी खुशी मिलती है, तो हम उसे नजरअंदाज करके आगे बढ़ जाते हैं। क्योंकि आगे हमें लगता है कि और भी इससे बड़ी खुशी मिलेगी। लेकिन जीवन ऐसा नहीं होता है।

गुरुजी आगे कहते हैं कि कभी दे आगे की मत सोचो हमेशा हमें वर्तमान काल की सोचना चाहिए और जीना चाहिए।

2. करोली ताकस

यह कहानी उस शूटर की है, जिससे आज भी बहुत सारे लोग प्रेरणा लेते हैं। और उस आदमी का नाम करोली ताकस था। हंगरी देश का सबसे बड़ा और बेस्ट शूटर करोली ताकस था।

वह उस देश में हुए सभी चैंपियनशिप को जीत जाता था और लोगों को भी लगने लगा कि 1940 में होने वाले इंटरनेशनल ओलंपिक टूर्नामेंट में भी यह गोल्ड जीत लेगा।

करोली ताकस का अपने जीवन में एक ही सपना था कि ओलंपिक टूर्नामेंट में गोल्ड मेडल जीतना। इसके लिए उसने बहुत सालों से दिन रात मेहनत करके अपने हाथों को बेस्ट शूटिंग हैंड बनाने के लिए शुरू कर दिया। और इसमें करोली कामयाबी हो गया था।

लेकिन ओलंपिक टूर्नामेंट से पहले 1938 को करोली ताकस आर्मी ट्रेनिंग कैंप में हिस्सा ले रहे थे। क्योंकि वह आर्मी के जवान भी थे और ट्रेनिंग के वक्त उसके हाथ में एक ग्रेनेड फट गया, जिसकी वजह से उसका हाथ कट गया था। जिससे वह शूटिंग करता था।

इसी के साथ करोली का इंटरनेशनल ओलंपिक टूर्नामेंट में गोल्ड मेडल जीतने का सपना भी बुरी तरह से टूट गया था। क्योंकि उसका हाथ कट गया था। लेकिन अगर इसकी जगह और कोई होता है, तो वह उदास होकर आत्महत्या कर सकता था।

लेकिन करोली ताकस उनमें से नहीं था। उसने कुछ ही महीने के बाद फिर से अपने बाएं हाथ से शूटिंग करना शुरू कर दिया और पहले से भी ज्यादा दिन रात मेहनत करने लगा। इसके बाद 1 साल बाद 1939 को करोली ताकस ने अपनी वापसी का एलान कर दिया और उसी वक्त हंगरी में नेशनल चैंपियनशिप का टूर्नामेंट हो रहा था।

उसमें करोली ताकस ने सबको हैरान करते हुए हिस्सा लिया। लेकिन वहां पर हिस्सा ले रहे लोग समझ रहे थे कि वह सिर्फ मैच देखने आया है और हिस्सा लेने वालो का हौसला बढ़ाने आया है। लेकिन करोली ताकस ने कहा कि मैं हौसला बढ़ाने नहीं, तुम सबसे कंपीट करके जितने आया हूं।

करोली ताकस ने सबसे कहा कि अब तैयार हो जाओ और बाकी सब लोग अपने सबसे मजबूत हाथ से कंप्लीट करने आए थे और वही करोली ताकस अपने अकेले हाथ से। मैच देखने आए सभी लोग उसे देख कर हैरान थे। किसी को नहीं पता था कि वह पिछले 1 साल से अपने सपने को पूरा करने के लिए दिन-रात प्रैक्टिस करता रहता था।

नेशनल चैंपियनशिप जीतने के बाद 1940 में होने वाले ओलंपिक के लिए अब करोली ताकस तैयारी करने लगा और उसका फोकस उसी टूर्नामेंट पर था। लेकिन दुर्भाग्यवश वर्ल्ड वार की वजह से वह टूर्नामेंट रद्द हो गया और फिर बाद में करोली ताकस ने 1944 के ओलंपिक को जीतने का सपना बना लिया।

लेकिन वह भी परिवार की वजह से रद्द हो गया। इसके बाद करोली ताकस बहुत उदास हो गए। लेकिन उसने अभी तक अपना सपना नहीं छोड़ा था। उसकी नजर अब 1948 में होने वाले ओलंपिक में पढ़ी। लेकिन तब तक उनकी उम्र बढ़ चुकी थी और उस टूर्नामेंट में हिस्सा लेने के लिए बहुत सारे युवा आ गए थे, जो कि बहुत ताकतवर शूटर थे।

उस टूर्नामेंट में सबको हैरान करते हुए करोली ताकस ने अपना सपना पूरा किया और ओलंपिक गोल्ड का खिताब जीतकर अपनी जिंदगी को सफल बनाया और करोली ताकस यहीं पर नहीं रुके। उन्होंने 1952 में हुए ओलंपिक में भी हिस्सा लिया और वहां पर भी गोल्ड मेडल जीतकर रिकॉर्ड बनाया है।

3. एकलव्य: एक वीर

अगर आप भारत के रहने वाले हैं, तो आपने जरूर एकलव्य का नाम सुना होगा। महाभारत काल में एकलव्य बहुत बड़े जंगल के राजकुमार थे और उस जंगल के राजा उनके पिताजी थे। बचपन से ही एकलव्य को धनुर्विद्या सीखने का बहुत मन था। इस वजह से उस वक्त के सबसे बड़े धनुर्विद्या सिखाने वाले द्रोणाचार्य उस समय पांडवों को और गौरव को धनुर्विद्या सिखाते थे।

एकलव्य को उनके बारे में पता चला और अपने धनुर्विद्या को प्राप्त करने के लिए एकलव्य द्रोणाचार्य के आश्रम में चले गए। वापस एकलव्य द्रोणाचार्य से मिले और उनसे कहा कि मैं आपका शिष्य बनना चाहता हूं।

लेकिन द्रोणाचार्य को यह पता था कि एकलव्य निषाद पुत्र है, जिस वजह से वह उन्हें धनुर्विद्या नहीं सिखा सकते। क्योंकि द्रोणाचार्य जी सिर्फ और सिर्फ ब्राह्मण और क्षत्रिय को ही धनुर्विद्या सिखाते थे। इस बात से उदास होकर एकलव्य वापस अपने घर की ओर चल पड़े। लेकिन इस दुनिया का सबसे बेस्ट धनुर्धारी बनने का सपना एकलव्य ने नहीं छोड़ा था।

एकलव्य को अपने गुरु द्रोणाचार्य के प्रति इतनी भक्ति थी कि उसने जंगल में ही द्रोणाचार्य के मूर्ति बनाई और हर दिन उस मूर्ति के सामने धनुर्विद्या का अभ्यास करने लगा। वाकई में उसे सबसे बड़ा धनुर्धारी बनना था। इस वजह से वह दिन रात मेहनत करने लगा।

एक दिन जब वे अभ्यास कर रहे थे, तब पास में एक कुत्ता उसे बार-बार भोक कर परेशान कर रहा था। एकलव्य को जानवरों से बहुत प्रेम था, जिस वजह से उस कुत्ते को नुकसान किए बिना एकलव्य ने उसके मुंह पर कई सारे बाण मारे और वह कुत्ता डर कर चला गया।

वह कुत्ता द्रोणाचार्य के पास चला गया, द्रोणाचार्य उस कुत्ते के मुंह पर देखकर हैरान रह गए। क्योंकि कुत्ते को नुकसान पहुंचाए बिना ऐसे बाण मारना किसी आम आदमी का काम नहीं होगा। फिर वह उस कुत्ते को लेकर जंगल में चले गए। फिर उन्होंने एकलव्य को अपने मूर्ति के सामने अभ्यास करते हुए देखा।

और उन्होंने एकलव्य से पूछा कि “क्या तुमने इस कुत्ते को इस तरह से बाण मारा है?” तो एकलव्य ने जवाब देते हुए कहा “हां गुरुजी”। द्रोणाचार्य जी ने कहा कि “तुम्हारा गुरु कौन है? तू किससे धनुर्विद्या सकते हो?”

इस बात का जवाब देते हुए एकलव्य ने कहा कि “आप स्वयं मेरे गुरु है, मैं हमेशा आपसे धनुर्विद्या सकता हूं”। यह बात सुनकर द्रोणाचार्य हैरान रह गए। तब एकलव्य ने कहा कि जबसे आपने मुझे धनुर्विद्या न सीखने का फैसला लिया था, तब से मैं आपके मूर्ति के सामने अभ्यास करता हूं और उसे ही अपना गुरु मानता हूं।

लेकिन गुरु द्रोणाचार्य बहुत परेशान हो गए। क्योंकि उन्होंने पांडु पुत्र अर्जुन को सबसे बड़ा और बेस्ट धनुर्धारी बनाने का प्रण लिया था। लेकिन अर्जुन से भी सबसे बड़ा धनुर्धारी एकलव्य बन गया था। इस वजह से द्रोणाचार्य के मन में एक ख्याल आया और उन्होंने गुरु दक्षिणा के रूप में एकलव्य से अपना अंगूठा मांग लिया।

बिना सोचे समझे एकलव्य ने सबके सामने पत्थर से अपने अंगूठे को काटकर द्रोणाचार्य को दे दिया। इसे देखकर द्रोणाचार्य हैरान रह गए। लेकिन कुछ पल के लिए अब अर्जुन सबसे बड़े धनुर्धारी बन गए। क्योंकि बिना अंगूठे के अब एकलव्य सबसे बड़ा धनुर्धारी नहीं बन सकता था।

लेकिन भक्ति और प्रेम की वजह से फिर एक बार बिना अंगूठे के एकलव्य हर दिन और रात धनुर्विद्या का अभ्यास करने लगे और बिना अंगूठे के वह सबसे बड़े धनुर्धारी फिर एक बार बन गए।

4. पेंटिंग

एक बार एक गांव में एक युवक बहुत सुंदर सुंदर पेंटिंग बनाता था। और उसे उसके पिताजी ने पेंटिंग बनाना सिखाया था। पिताजी तो नहीं रहे, इस वजह से वह युवक हर दिन एक पेंटिंग बनाकर शाम को बेच कर आ जाता था और उसे हर एक पेंटिंग के ₹500 मिल जाते थे।

ऐसा करते करते वह हर महीने ₹15000 आराम से कमा लेता था। इसके बाद 50 साल होने के बाद वह युवक बूढ़ा हो गया और अब उसमें पेंटिंग बनाने की क्षमता नहीं रही। इस वजह से अब वह अपने युवा बेटे को पेंटिंग सिखाने का निर्णय लेता है।

वह बूढ़ा बाप अपने युवा बेटे को कैसे पेंटिंग करते हैं! कैसे कलर लगाते हैं! इसके बारे में सारी जानकारी अपने बेटे को देता है और उसे पेंटिंग का कलाकार बनाता है। जब एक बार उसका बेटा पेंटिंग करना सीख जाता है, तो अपने पहली पेंटिंग को वह बाजार में जाकर भेजने की कोशिश करता है, तो उसे पहले दिन उस पेंटिंग के ₹100 मिल जाते हैं

वह लड़का अपने बाप के पास वह ₹100 लेकर आ जाता है और अपने बाप से कहता है कि “मुझे केवल ₹100 मिले हैं, बल्कि आपको तो एक पेंटिंग के ₹500 मिलते थे। ऐसा कैसे हुआ पिताजी?” पिता कहता है “अभी भी तुमको बहुत कुछ सीखना है, सीखते सीखते तुम ज्यादा कमा पाओगे”

यह बात जानकर बेटा अपने पिताजी से पेंटिंग की और ट्रेनिंग मांगता है। कुछ महीने बीत जाने के बाद बेटा पहले से भी ज्यादा अच्छी पेंटिंग कर लेता है। लेकिन अब वह पेंटिंग बनाने के बाद फिर से बाजार पेंटिंग को बेचने के लिए चला जाता है और उसे तब उसके पेंटिंग के लिए ₹200 मिलते हैं।

वह फिर से निराश होकर घर लौट आता है। क्योंकि वह फिर से ₹500 नहीं कमा पाया। अब वह लड़का अपने पिताजी से कहता है कि आप मुझे सही तरीके से पेंटिंग नहीं सिखा रहे हैं। और भी ऐसा कुछ खास है, जिससे मैं पेंटिंग को और सुंदर बना सकता हूं, जिसके बाद मुझे ज्यादा पैसे मिलेंगे।

इसके बाद वह बेटा अपने पिताजी से और ज्ञान मांगता है और पिताजी भी उसे ज्ञान देते चले जाते हैं। अब वह पेंटिंग का एक्सपर्ट बन जाने के बाद फिर से एक पेंटिंग बनाकर वह लड़का फिर बाजार जाकर अपनी पेंटिंग को कुल ₹700 में बेच कर आ जाता है।

अब वह खुश होकर घर पर आता है और अपने पिताजी से कहता है कि आपने सारी जिंदगी एक पेंटिंग से ₹500 कमाए और मैंने मेरी पेंटिंग को ₹700 में बेचा है। इसके बाद वह लड़का अपने पिताजी से कहता है कि अब मुझे अपनी पेंटिंग को ₹1000 में बेचना है।

यह बात सुनकर उसके पिता उसे कहते हैं कि इसके लिए तुम्हें और ज्ञान की जरूरत है और वह मैं तुम्हे सिखा दूंगा। तभी झट से उसका बेटा कहता है कि आपने कभी भी अपने जीवन में 500 से ज्यादा एक पेंटिंग के लिए पैसे नहीं कमाए हैं, तो मुझे कैसे सिखा सकते हैं।

यह बात सुनकर उसके पिता उसके बेटे को जीवन की सबसे बड़ी सीख देते हैं। और वह कहते हैं कि अभी तुम में बहुत अहंकार आ गया है। जब इंसान के अंदर अहंकार आ जाता है, तो उसके अंदर के सीखने की इच्छा खत्म हो जाती है।

इस वजह से अब तुम कभी भी ₹1000 नहीं कमा पाओगे। क्योंकि मैंने भी अपने पिताजी से ऐसी बात की थी। क्योंकि पिताजी ₹300 कमाते थे और मैं ₹500 कमाता था और मैंने भी तब से अपने पिताजी से अहंकार की वजह से ज्ञान लेना बंद कर दिया था। इस वजह से तुम कभी भी ज्ञान लेना बंद ना करो, अहंकार को छोड़ दो।

5. एक लड़का

एक गरीब लड़का था, जिसके घर में परिस्थिति बेहद गंभीर थी। क्योंकि उसका बाप भी छोटी नौकरी करके घर को पाल पोस रहा था। लेकिन वह लड़का हमेशा अपने अमीर दोस्तों के साथ रहता था। उनके साथ हर दिन 17 से लेकर 18 सिगरेट पीता था और और भी बहुत सारे नशे करता था।

पढ़ाई में भी वह लड़का आलसी था और ज्यादा पढ़ाई नहीं करता था। कैसे भी करके उसने 11वीं पास कर लिया और 12वीं में पहुंच गया। एक बार वह अपने अमीर दोस्तों के साथ बैठकर सिगरेट पी रहा था। तब उसने एक अमीर दोस्त से पूछा कि 12वीं के बाद तू क्या करेगा?

उसके दोस्त ने बताया कि अगर पास हुआ तो बड़ी कंपनी में नौकरी करने के लिए चला जाऊंगा और अगर फेल होता है तो मेरे पिताजी के बिजनेस को संभाल लूंगा। यह सुनकर वह गरीब लड़का हैरान रह गया। क्योंकि वह 12वीं पास होने के लायक तो नहीं था। लेकिन अगर वह फेल हो जाता है, तो उसके घर के हालत बद से बदतर हो सकते थे।

क्योंकि उसके माता-पिता को उनके बेटे पर बहुत विश्वास था कि वो 12वीं पास करके अच्छी नौकरी पाएगा और घर को संभालेगा। उस गरीब लड़के ने उसी वक्त अपने हाथ में मौजूद सिगरेट को फेंक कर सीधे घर की तरफ दौड़ने लगा और अपने जीवन के बारे में सोचने लगा।

अपने लड़के को चिंतित देखकर उसकी मां भी घबरा गई और उससे पूछा कि तू इतना उदास और चिंतित क्यों है? तो उसने कहा कि ऐसे ही सर दुख रहा है। और तब से लेकर 12वीं के एग्जाम तक उसने हर दिन 3 घंटे पढ़ने का निर्णय लिया और अंत में 12वीं की परीक्षा में उसने 75 प्रतिशत बनाएं।

इसके बाद उसने कई सारी नौकरी की, घर को संभाला और अपने सपने को पूरा करते हुए एक फोटोग्राफर बन कर एक कंपनी खोली। और अब वह बहुत सारी जगह पर मोटिवेशनल स्पीच भी देता है, उस लड़के का नाम संदीप महेश्वरी है।

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